Dr Amit Kumar Sharma

लेखक -डा० अमित कुमार शर्मा
समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली - 110067

हरियाणा में गोत्र विवाद

हरियाणा में गोत्र विवाद

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इस बीच रास्ते में मौजूद पुलिस बल ने जब उन्हें रोकने की कोशिश किया तो गुस्साए गांमीणों ने उन पर भारी पथराव किया। गांव में घुसने की कोशिश करते दूबलधन गांव के लोगों पर ढराणा के गहलोत लोगों ने भी पथराव किया। दोनों ओर से जारी पथराव की चपेट में कई पुलिस कर्मी घायल हुए। अन्य 36 लोग भी घायल हुए। यह घटना 19 जुलाई 2009 को हुई।
हरियाणा के दो गांवों के बीच गोत्र विवाद अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट इस पर फैसला सुनायेगा परंतु इस बीच यह मामला मीडिया में सनसनी खेज मसाला बन गया है। आधुनिकता के रंग में रंगे लोग पूछ रहे हैं कि इस समय जब एक कोर्ट ने विवाह को कानूनी मान्यता दे दी है तो दूसरी ओर हरियाणा का गोत्र विवाद सामने आया है। क्या प्यार करने से पहले लोग एक - दूसरे का गोत्र पूछते हैं? क्या होमोसेक्सुअल विवाहों पर भी गोत्र लागू होगा? गोत्र कातिल बन गया है।
इसी बीच 23 जुलाई को हरियाणा के कैथल जिले में एक दूसरी घटना घट गई। परिवार की सहमति के बिना घर से भागकर अपने ही गोत्र की लड़की से प्रेम विवाह करने वाले युवक को उसके गांव वालों ने पीट-पीट कर मार डाला। कैथल जिले के मटौर गांव निवासी वेदपाल (21वर्ष) ने जींद जिले के सिंधवाल गांव की सोनिया से इस साल(2009 के मार्च) कोर्ट में विवाह किया था। इस पर सिंधवाल पंचायत ने फरमान जारी कर कहा था कि एक ही गोत्र के होने के कारण दोनों भाई-बहन हैं। करीब 20 दिन पहले मायके आई सोनिया को जब उसके परिजनों ने वापस नहीं भेजा तो वेदपाल ने हाईकोर्टकी शरण ली। बुधवार 22 जुलाई 2009 को देर शाम वेदपाल हाईकोर्ट के वारंट ऑफिसर सूरजभान को लेकर सोनिया को लेने सिंघवाल पहुंचा तो गांव वालों ने उसे पीट पीट कर जान से मार दिया।

ये तीनों तीन अलग प्रकार के मामले हैं। झज्जर जिले का मामला तकनीकी रूप से गोत्र विवाह का मामला न होकर विलेज एक्सोगैमी का मामला है। भारत के कुछ गांवों में विलेज या गांव के भीतर रहने वाले सभी लोग एक पिण्ड के माने जाते हैं और उनके बीच विवाह वर्जित होता है। लेकिन यहां लड़का-लड़की न एक गोत्र के हैं और न एक गांव के हैं। यह या तो नासमझी का मामला है या आपसी रंजिश का मामला है जिसके तहत पारम्परिक नियम या प्रथा की गलत व्याख्या करके एक परिवार को प्रताडित किया जा रहा है।  यह पंचायत और कादियान खाप का अपराध है।

दूसरा मामला प्रेस का है। आधुनिकवादियों ने दो दुर्भाग्य पूर्ण घटनाओं की आड़ में गोत्र एवं विवाह की पारम्परिक हिन्दू संस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह आधुनिक असहिष्णुता का बहुत ही नाजायज और तर्कहीन उदाहरण है। पूरे भारत में हिन्दू समाज के भीतर जाति के भीतर एवं गोत्र के बाहर विवाह करने की प्रथा है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एक गोत्र के स्त्री-पुरूष आपस में भाई-बहन माने जाते हैं चूंकि इनके पूर्वज एक माने जाते हैं। ऐसे विवाह को परम्परा आनुवंशिक विवाह मानती है जिसमें पैदा हुए बच्चों के भीतर शारीरिक एवं मानसिक दोष पैदा होता है। दुनिया के हर समाज में भाई-बहनों के बीच या रक्त संबंधियों के बीच विवाह का निषेध पाया जाता है जिसे इनसेस्ट टैबू कहा जाता है। भारतीय संविधान के अनुसार भी हिन्दू पर्सनल लॉ के तहत उपरोक्त् नियमों की मान्यता है। अत: यह कहना  युक्ति संगत नहीं है कि जब होमोसेक्सुअल विवाह हो सकता है तो गोत्र के भीतर विवाह कैसे नहीं हो सकता। हर समुदाय को अपनी सांस्कृतिक पहचान कायम रखने का अधिकार है। जो लोग गोत्र की अवधारना में विश्वास हीं नही रखते वे कानूनी भाषा में पारम्परिक हिन्दू नहीं है। ये लोग आधुनिक भारतीय नागरिक हैं। इनमें जे ज्यादातर लोग धर्मनिरपेक्ष हैं। ये लोग विवाह को एक धार्मिक संस्कार न मानकर एक कानूनी समझौता मानते हैं। इनके लिए विवाह का एकमात्र अर्थ कानून सम्मत यौन संबंध है। ऐसे लोग ही होमोसेक्सुअल विवाह को जायज मानते हैं। ऐसी मान्यता वाले जजों ने ही इसे कानूनी दर्जा दिया है। परन्तु इसका सभी धर्मों के आचार्यों ने विरोध किया है। हिन्दू धर्म में तो विवाह एक धार्मिक संस्कार है जो एक स्त्री-पुरूष जोड़े को सात जन्मों तक एक-दूसरे का साथी बने रहने का आशीर्वाद देता है। भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं के लिए विवाह संस्कार गोत्र के भीतर नहीं किया जाता। कोई भी प्रशिक्षित पुरोहित ऐसे विवाह नहीं करवाता। कोई समुदाय ऐसे विवाह को मान्यता नहीं देता। प्यार हो जाने पर भी भाई-बहन को विवाह की अनुमति नहीं दी जा सकती। हर समुदाय को भाई-बहन की सांस्कृतिक परिभाषा गढ़ने और मानने का अधिकार है।

तीसरा मामला एक गोत्र के भीतर विवाह का है लेकिन विवाह पारम्परिक तरीके से किसी पुरोहित द्वारा या मंदिर में नहीं किया गया है। यह विवाह कोर्ट में किया गया है। इसीलिए हाईकोर्ट ने इसे मान्यता दिया है। इस विवाह को खारिज करने का अधिकार पंचायत को नहीं है परंतु पंचायत को यह अधिकार है कि लड़का- लड़की को जाति बहिष्कृत करके हुक्का-पानी बंद कर दे। परंतु पंचायत या गांव वालों को या लड़की के परिवार को लड़के को जान से मारने का अधिकार नहीं है। यह हत्या का अपराध है और कातिलों को भारतीय संविधान के अनुसार सजा मिलनी हीं चाहिए। उपरोक्त घटनायें हिन्दू समाज के भीतर संक्रमण काल की प्रसव पीड़ा का दर्शाता है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण, पौरोहित्य प्रशिक्षण एवं धार्मिक शिक्षा दिये बिना काम नहीं चलेगा। नई पीढ़ी को संस्कारित करना जरूरी है। बिना संस्कारित किए उनसे धार्मिक कर्त्तव्यों के पालन की कैसे उम्मीद की जा सकती है।

गोत्र विवाद और जातिगत पंचायतों के फैसलों का काला इतिहास भौगोलिक रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा समेत राजस्थान के कुछ इलाकों तक फैला हुआ है। इसके दायरे में केवल जाट समाज ही नहीं आता। इस क्षेत्र में बसने वाली अधिकांश जातियां आती हैं। न ही परम्परा के भदेस और विकृत रूप ही इसके मुख्य घटक हैं। यह मसला तो प्रमुख रूप से आधुनिकीकरण की प्रक्रिया और हरित क्रांक्ति से जुड़ा हुआ है। खेती के कामयाब पूंजीवादी हरित क्रांति और ग्रामीण जीवन के निरंतर कस्बाईकरण से बेहद अरूचिकर सामाजिक परिणाम निकल रहे हैं। ये विकृतियां परम्परा की नहीं, बल्कि आधुनिकता के अनिच्छित और अवांक्षित रूपों की देन हैं। लेकिन यह भी सच है कि ऐसी  घटनाओं से पंजाब का इलाका तुलनात्मक रूप से अछूता है। इसका प्रमुख कारण पंजाब में सिख धर्म का प्रभाव माना जा सकता है।
हरित क्रांति के अन्य इलाकों में हिन्दू समाज के भीतर आर्यसमाज का ज्यादा प्रभाव है। दुर्भाग्य से आर्यसमाज की विचारधारा उपरोक्त विकृतियों को रोकने में समर्थ नहीं हो पायी हैं। इस समस्या का समाधान कानून बनाकर नहीं किया जा सकता। इसका उपाय तो सांस्कृतिक आंदोलन से ही निकलेगा। हिन्दू समाज ऐसे सांस्कृतिक नवजागरण के लिए छटपटा रहा है। हमें परम्परा और आधुनिकता के बीच पुल बनाना पड़ेगा। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच संवाद कायम करना पड़ेगा। तभी सांस्कृतिक अस्मिता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच समन्वय हो  पायेगा। सांस्कृतिक संहिताओं, इज्जत, पितृसत्ता और आधुनिक हिंसा के मिलेजुले घटकों से उपजे सामाजिक गतिरोध और विष्फोट का निराकरण हो  पायेगा। इस इलाके में बढ़ते गोत्र विवाद का मूल कारण कन्या भ्रूण हत्या है। लड़कियों की दिन - प्रतिदिन घटती संख्या से विवाह में परेशानी आ रही है, ऐसे में गोत्र की परम्परा तोड़कर शादी कर ली जाती है, जिसपर विवाद हो जाता है। बढ़ते विवादों से चिंतित  खाप - पंचायतें कन्या भ्रूण हत्या को मूल जड़ मान इसे रोकने के लिए अभियान छेड़ने की तैयारी में हैं। वर्तमान में हरियाणा प्रदेश में पुरुष और महिलाओं का अनुपात 1000:861 है। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद इसमें सुधार नहीं हो रहा। पंच - पटेल भी मानते है कि लड़के का विवाह समस्या बनता जा रहा है। कई जगह तो संपन्न परिवारों को लड़की मिलना मुश्किल हो रहा है, मध्यम व गरीब परिवारों के हालात ज्यादा बदतर है। कभी पंडित - पुजारी शादी का माध्यम बनते थे, अब मुनाफाखोर दलालों ने रिश्ते कराने को धंधा बना लिया है। दूसरे प्रदेशों से भी लड़कियां खरीद कर लाई जा रही हैं। पंच - पटेलों का मानना है कि ये हालात गोत्र विवाद से कहीं बड़े है।
हर जाति समूह में तीन या चार गोत्रों में विवाह करने पर रोक होती है। अपने गोत्र में, अपनी मां के गोत्र में , पिता की मां के गोत्र में और मां की मां के गोत्र में विवाह करना उचित नहीं समझा जाता। जाट जाति में ऐसे किसी गांव से रिश्ता करने पर भी पाबंदी है जिसकी सीमा भी पैदाइश वाले गांव से छूती हो। आजकल इन धारणाओं पर जोर देने के आर्थिक आयाम भी जुड़ गए हैं। जिन समुदायों को इन सांस्कृतिक नियमों पर बल देने से जितना फायदा होता है, वे उतनी ही कड़ाई से उसके अनुपालन की जिद करते हैं। उत्ताराधिकार में बेटी को मिलने वाली संपत्ति भी हिंसक प्रतिक्रियाओं का कारण बनती है। दामाद अगर गांव  या आसपास का ही होगा तो जमीन बटने की नौबत आ जाती है। कई बार भाइयों के बीच जमीन बंटने के डर से भी सांस्कृतिक नियमों के तहत उनके विवाह को परम्परा विरूध्द ठहरा कर मार दिया जाता है या गांव से बहिष्कृत कर दिया जाता है। जाति के बाहर विवाह करने पर अनुलोम और प्रतिलोम का पारम्परिक नियम रहा है। इसके अनुसार लड़की की जाति लड़के की जाति से ऊँची नहीं होनी चाहिए। प्रेम विवाह भी अगर उपरोक्त नियम के खिलाफ हुआ तो ज्यादा विरोध किया जाता है। परंतु अगर उपरोक्त नियम अनुसार हुआ तो विरोध का स्वर धीमा या कम हिंसक होता है। अनुलोम - प्रतिलोम का नियम शुरू में गोत्रों के ऊँच - नीच से जुड़ा हुआ था। जब प्रेम विवाह के तहत अंतर्जातीय विवाह होने लगे तो इसे जातियों के ऊँच - नीच से जोड़ दिया गया। अब तो इसे वर्ग के ऊँच - नीच से भी जोड़ा जाने लगा है। इस तरह हम देखते हैं कि विवाह या गोत्र का मामला केवल बहाना है, विवाद का असली कारण परम्परा से आधुनिकता की ओर संक्रमण की दुखद प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। पंचायतें इसकी तह में जाये बिना फैसला देने लगी हैं। मीडिया भी इसकी तह में गये बिना पंचायतों को तालिबान कहने लगी हैं। यह एक तरफ पंचायतों का जाहिलपन प्रदर्शित करता है तो दूसरी तरफ मीडिया में कार्यरत आधुनिकता वादियों की असहिष्णुता । इससे बात बनती नहीं बिगड़ती है। संवादहीनता बढ़ती है। मामला और जटिल होता है। एक बार विवाह हो जाने के बाद उस विवाह को निरस्त करने का अधिकार पंचायतों को नहीं है। पारम्परिक हिन्दू विवाह एक संस्कार है और यह एक अटूट बंधन है। इसमें तलाक की कोई सुविधा नहीं है। तलाक आधुनिक हिन्दू विवाह में होता है, कोर्ट में किए गए विवाह में होता है, पारम्परिक हिन्दू विवाह में नहीं। ऐसे विवाह यदि गलत प्रक्रिया से हुए हैं तो प्रायश्चित का विधान है। या इन्हें जाति - बहिष्कृत किया जा सकता है। पंचायतें अपनी हद से बाहर हो रही हैं। वे भारतीय परम्परा और भारतिय संविधान दोनों का अतिक्रमण कर रही हैं। मीडिया अपनी नासमझी और असहिष्णुता में पंचायतों को कठघड़े में खड़ा करने के बजाय परम्परा, हिन्दू विवाह, गोत्र और सांस्कृतिक अस्मिता पर ही प्रश्न खड़ा कर रहा है।
विवाह और परिवार आपस में जुड़ी हुई संस्थाएं हैं। यह किसी भी समाज की मूल इकाई है। समकालीन भारत में परिवार और विवाह दोनों बदल रही हैं। पारिवारिक विघटन और तलाक की घटनायें बढ़ रही हैं। इसका सबसे खराब प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। विघटित परिवार का बोझ बच्चों पर ही पड़ता है। दरअसल परिवारों के विघटन के प्रभाव जितनी गहराई से पिछले दशकों में पड़ते थे, अब उनकी धार कम हो गई है। कारण्, विपरीत परिस्थितियों से जूझने के लिए युवा पीढ़ी आज पहले से ज्यादा तैयार है। वे जीवन को निहायत ही अनौपचारिक ढंग से लेते हैं और रिश्तों के टूटने को जीवन का सहज हिस्सा मानते हैं। अब इन मामलों में पहले वाली अति भावुकता और नाटकीयता नहीं रही। दर्द की अभिव्यक्ति और उसके प्रति दृष्टिकोण बदल गया है।
भावना विहीन मनुष्य की अवधारणा पर साहित्य में तीन महत्वपूर्ण कृतिर्या हैं। प्रेमचंद की कफन, कामू की आउट साइडर और समरेस बसु की विविर।

कफन की भावना विहीनता गरीबी के कारण है। कामू और बसु के पात्रों की भावना विहीनता के अन्य कारण हैं। आज के युवा की अनौपचारिकता को समझना आसान नहीं है। विगत दशकों में इस तरह की सोच को विद्रोह मानकर युवा को नायक माना जाता था। आज उसी तरह की बेलाग बेतकल्लुफी बरतने वाले को खलनायक समझा जाता है। नई पीढ़ी शोषण के लिए तैयार नहीं है। पुरानी पीढ़ी की तरह वह आसानी से ठगी नहीं जा सकती। पूर्वजों का सदियों का  शोषण का शिकार होना नई पीढ़ी के लिए बीता हुआ इतिहास है। वे लोग पुराने शोषण की साए से भी मुक्त हैं। मनुष्य फार्मूला नहीं है, व्यवहार टाइप नहीं है, चरित्र स्टॉक नहीं है। नई पीढ़ी के युवा अपने तरह के मनुष्य हैं, उनका अपना व्यवहार है, उनका अपना चरित्र है। पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी के साथ हर हालत में संवाद बनाए रखना चाहिए। उनके विचारों, आकांक्षाओं,मंजिलों और अध्यात्मिकता को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

 

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